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Showing posts from February, 2009

उम्मीद

संवलाई शाम
मटमैला सूरज
अलसाई धूप
उदास आँगन
फूलों के रंग भी फीके फीके
कल्पनाएँ
मानो जंगल हो गई हैं
मन का हिरण
दौड़ता हांफता
लगा है थकने
धुंधली पड़ने लगी हैं
मेरी अल्पनायें
बावजूद इसके ...
मैंने सहेज रखी हैं
मुट्ठी भर किरणे
निर्मल
सलोनी सुबह के लिए ...

तुम्हारी हँसी

चोंक जाती है
हर आहट पर
मेरी अनकही खामोशी
तुम्हारी
सोंधी सी हँसी
बिखर जाती है
पलाश के फूलों की तरह
मेरे हिरदे आँगन में
देने को मुझे आमंतरण
तुम्हारी
भीगी सी हँसी के आमंतरण से
बिंध जाता है
मेरा हर सन्नाटा
और
बह उठती हूँ मैं
मदमाते झरने सी ...

मन की ग़ज़ल

"मन "की यह ग़ज़ल मुझे ऐसी लगती है कि मैंने कही हो , आप भी देखिये :-----

कुछ वो पागल है कुछ दीवाना भी ।
उसको जाना, मगर न जाना भी ।

यूँ तो हर शय में सिर्फ़ वो ही वो ,
कितना मुश्किल है उसको पाना भी ।

उसके अहसास को जीना हर पल
यानी, अपने को भूल जाना भी ।

उस से मिलना , उसी का हो जाना
वो ही मंजिल वही ठिकाना भी ।

आज पलकों पे होंठ रख ही दो ,
आज मौसम है कुछ , सुहाना भी ।