Tuesday, February 24, 2009

उम्मीद

संवलाई शाम
मटमैला सूरज
अलसाई धूप
उदास आँगन
फूलों के रंग भी फीके फीके
कल्पनाएँ
मानो जंगल हो गई हैं
मन का हिरण
दौड़ता हांफता
लगा है थकने
धुंधली पड़ने लगी हैं
मेरी अल्पनायें
बावजूद इसके ...
मैंने सहेज रखी हैं
मुट्ठी भर किरणे
निर्मल
सलोनी सुबह के लिए ...

Monday, February 23, 2009

तुम्हारी हँसी

चोंक जाती है
हर आहट पर
मेरी अनकही खामोशी
तुम्हारी
सोंधी सी हँसी
बिखर जाती है
पलाश के फूलों की तरह
मेरे हिरदे आँगन में
देने को मुझे आमंतरण
तुम्हारी
भीगी सी हँसी के आमंतरण से
बिंध जाता है
मेरा हर सन्नाटा
और
बह उठती हूँ मैं
मदमाते झरने सी ...

Monday, February 16, 2009

मन की ग़ज़ल

"मन "की यह ग़ज़ल मुझे ऐसी लगती है कि मैंने कही हो , आप भी देखिये :-----

कुछ वो पागल है कुछ दीवाना भी ।
उसको जाना, मगर न जाना भी ।

यूँ तो हर शय में सिर्फ़ वो ही वो ,
कितना मुश्किल है उसको पाना भी ।

उसके अहसास को जीना हर पल
यानी, अपने को भूल जाना भी

उस से मिलना , उसी का हो जाना
वो ही मंजिल वही ठिकाना भी ।

आज पलकों पे होंठ रख ही दो ,
आज मौसम है कुछ , सुहाना भी ।