Tuesday, February 24, 2009

उम्मीद

संवलाई शाम
मटमैला सूरज
अलसाई धूप
उदास आँगन
फूलों के रंग भी फीके फीके
कल्पनाएँ
मानो जंगल हो गई हैं
मन का हिरण
दौड़ता हांफता
लगा है थकने
धुंधली पड़ने लगी हैं
मेरी अल्पनायें
बावजूद इसके ...
मैंने सहेज रखी हैं
मुट्ठी भर किरणे
निर्मल
सलोनी सुबह के लिए ...

3 comments:

  1. Bahut achhi KAVITA hai, badhai!!! Ummeed ki sunhari kiran ke liye bhi sadhuwaad !!!!

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  2. कहीं कुछ अधूरा सा है, कुछ छूटा सा है। पर पूरा होने की आशा अच्‍छी लगती है।

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  3. मैंने सहेज रखी हैं
    मुट्ठी भर किरणे
    निर्मल
    सलोनी सुबह के लिए ...

    bahut sundar.....badhai

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